Friday, August 17, 2018

लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पायी



        
-नागेंद्र प्रसाद

1757,से अंग्रेजों ने, भारत मे लूट मचा रखी थी।
 इस लूट के खिलाफ, भारतीयों का आक्रोश विभिन्न विद्रोह के रूप मे सामने आया। संयासी विद्रोह 1763-1800,मिदना पुर विद्रोह 1766-67,रंग पुर वजोरहट विद्रोह 1769-99,चिटगांव का चकमा आदि वासी विद्रोह 1776-89, ,पहाड़िया सरदार विद्रोह 1778, रंगपुर किसान विद्रोह 1783,  रेशम कारीगर विद्रोह 1770, 1800,वीर भूमि विद्रोह, 1788--89, मिदनापुर आदि वासी   विद्रोह 1799’,विजय नगरम विद्रोह 1794केरल मे कोट्टायम  विद्रोह 1787-1800, त्रावणकोर कोर का बेलूथमबी विद्रोह 1808-1800,वैलोर सिपाही विद्रोह 1806, कारीगरों का विद्रोह1795-1805, सिलहट विद्रोह 1787-1799, खासी विद्रोह 1788,भिवानी विद्रोह 1789, पलामू विद्रोह 1800-1802, बुंदेलखण्ड  मुखियाओ का विद्रोह 1808-1812,छोटानागपुर, पलामू, चाईबासा, का कोल विद्रोह 1820-1837,कटक पुर  विद्रोह 1817-18, खानदेश, थारव मालवा भील विद्रोह -31,1846,1852,बंगाल  आर्मी  बैरकपुर  मे प्लाटून  विद्रोह 1824, गूजर विद्रोह 1824, भिवानी हिसार रोहतक विद्रोह 1824-26,कालपी विद्रोह 1824,बहावी आंदोलन 1830-61,चौबीस,हजारा मे शैयद का विद्रोह 1848,गुजरात का भील विद्रोह1809-28,संथाल विद्रोह 1855-56,पलासी का युद्ध 1757,इस तरह अंग्रेज शासन-प्रशासन के खिलाफ देश मे निरंतर  विद्रोह चल रहे थेकभी यह विद्रोह 1857,के सिपाही विद्रोह के शक्ल  मे,तो कभी झासी की रानी की अंग्रेज शासन-प्रशासन के खिलाफ जंग की सूरत मे
     
आजादी के लिए  देश मचल रहा था अंग्रेजो से दो राष्ट्र के आधार पर भारत  को आजादी मिली। भारत  का विभाजन ,माउंट बेटेन की योजनानुसार, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के आधार पर किया गया । इस अधिनियम  के अंतर्गत कहा गया,कि भारत और पाकिस्तान 15 अगस्त 1947को दो स्वतंत्र देश बना दिए जाएंगे । गौरतलब है कि,15अगस्त का दिन  इसलिए तय किया गया था कि उसी दिन जापान की सेना ने समर्पण किया था हमने आजादी ली नही, हमें आज़ादी मिली वहभी देश को खंडित कर । अब इस आजादी की खुशी मनाएं या गम। खंडित देश की आजादी आज भी देश के दुख-दर्द का सबब बना हुआ है। ऐसा था कि दूसरे विश्व युद्ध के कारण ब्रिटेन की रीढ टूट  चुकी थी। सरकार ब्रिटेन मे जनमत खो चुकी थी । वैश्विक समुदाय भी विरोध कर रहे थेराज- कोष की हालत गंभीर थी  । ऐसे मे सदियो से आजादी के लिए  बैचैन भारत को नियंत्रित रख पाना ब्रिटेन के लिए संभव नही था । भारत मे शासन के लिए दशी बलों का भरोसा भी गंवा चुकी थीइसी कालखंड मे ब्रिटेन को अपने ऊपनिवेशों को आजाद करने की विवशता भी आन पडी थी । भारत मे भी इनके शासन के काल पर ग्रहण लग चुका था । शासन पाने की ललक यदि देशहित  पर भारी पड़ती तब देश का विभाजन नही होता
देश की आजादी यदि शस्त्र  क्रान्ति  से मिली होती,तो शायद देश का विभाजन नही होता
शासन तब उन हाथों में,शायद  नही होती जिन के कारण देश अपने अस्तित्व से ही जूझ रहा है आज । इस खंडित  आजादी ने देश के वीर  सपुतो को शर्मसार किया,जो जंगे आजादी मे शहीद हुए । खंडित देश की आजादी ने देश हित को नजरअंदाज कर  शासन पाने की ललक पाले लोगो को निहाल कर दिया ।इसलिए ही तो कहते है -उनकी तुरबत पर नही है ,एक भी दिया जिनकी खून  से जलते है,ये चरागे वतन, जगमगा रहे है,मकबरे उनके ,बेचा करते थे,जो शहीदो के कफन
आजादी तो मिली । अब सवाल उठा,565 रियासतो के भारत मे विलय का
  इन 565 रियासतो के विलय भारत मे कराने का जिम्मेदार बनाया गया सरदार पटेल को । इन रियासतो का भारत में विलय हो गया
  केवल काश्मीर का विलय नेहरू जी के हाथ मे था । काश्मीर की उस समय स्थिति का ज़िक्र आवश्यक भी है और प्रस्तुतिकरण की माँग  भी। उस समय काश्मीर के राजा हरि सिंह थेप्राचीन  काल मे काश्मीर महर्षि  कश्यप के नाम पर हिन्दू और बौद्ध धर्म की संगम स्थल रहा था।
राज तरंगिणी ,कलहन द्वारा बारहवी शताब्दी मे लिखा गया था
तबतक पूर्ण हिन्दू राज्य रहा था ,यहा । तीसरी शताब्दी मे अशोक सम्राट के राज्य का हिस्सा रहा यह । उसी काल मे बौद्ध धर्म  का यहा  आगमन हुआ थाअवंति वर्मन ने श्रीनगर के निकट अवंतिपुर बसाया था । उसे ही अपनी राजधानी बनायायहा महाभारत  काल के खीर भवानी मंदिर आज भी मिलते है । गिलगिट मे पाडूलिपियां है,जो पाली भाषा में है  । त्रिखाशास्त्र भी यहीं की देन है । ऐसा माना जाता है कि यहां के मूल निवासी हिन्दू थे । काश्मीर के पंडितों की संस्कृति लगभग 6000 साल पुरानी है । वे ही काश्मीर के मूल निवासी हैं । चौदहवीं शताब्दी मे यहां मुस्लिम शासन शुरू हुआ । उसी काल मे फारस से सूफी इस्लाम का भी यहां आगमन हुआ  । यहां ऋषि परंपरा,त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम  का संगम मिलता है।
चौदहवी शताब्दी मे दुलुचा नामक आतंकी ने यहां आक्रमण किया। गांव और नगर को नष्ट कियानर संहार किया,धर्मांतरण कराया, कुछ हिन्दुओं ने धर्मान्तरण के डर से जहर खा लिया, कुछ भाग गये  । जम्मू-कश्मीर, लद्दाख पहले हिन्दू शासकों,फिर मुस्लिम सुल्तानों के अथीन रहे । बाद मे मुगल शासन का हिस्सा बने।
     1889 में रंजीत सिंह ने काश्मीर को अपने राज्य मे मिला लिया1846मे रंजीत सिंह की मौत के बाद,अंग्रेजों ने सिखो को हराकर, इस राज्य को 75 लाख में डोगरा वंश को सौंप दिया ! इस वंश ने यहा सौ साल राज किया ।हरिसिंह इसी वंश के उत्तराधिकारी राजा थे । हरिसिंह के शासन काल में शेख अब्दुला मुस्लिमो के नेता के रूप  मे सक्रिय थे । हरिसिंह की पाकिस्तान मे मिलने की मंशा नही थी । शेख की भी ऐसी ही मंशा थी । घाटी की बहुसंख्यक आबादी भारत मे विलय चाहती थी । हरि सिंह विलय के साथ शासन चाहते थे  । शेख की भी यही इच्छा  थी, विलय भारत मे हो लेकिन शासन उन्हें मिले । नेहरू जी शेख को शासन दिलाना चाहते थे  । हरिसिंह  शेख को सता देना नही चाहते थे 
शेख का पाकिस्तान में कोई भविष्य नही था  । जिन्ना की नजर मे शेख की कोई  अहमियत  नही थी  । शेख  दो देश के खिलाफ थे, जबकि  जिन्ना दो देश चाहते थे  । शेख के इस विचार का खुलासा अक्टूबर 1947 मे हजूरीबाग में दिए  ऊनके भाषण से होता है 
शेख ने डोगरों कश्मीर छोड़कर जाओ का नारा दिया । इसलिए राज्य द्रोह के अपराध मै हरिसिंह ने शेख को कैद कर लिया । नेहरू जी का हरिसिंह पर शेख को रिहा करने और शेख को शासन सौपने का दबाव बढ़ता जा रहा था  इसी बीच पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया ,हरिसिंह  को अपनी हुकूमत सुरक्षित रखने के लिए काश्मीर का भारत के साथ विलय करना पड़ा  भारतीय सेना कश्मीर  मे ऊतरी और पाकिस्तानी सेना को पीछे खदेड़ते हुए  आगे बढी   तभी नेहरू जी 20 जनवरी 48 को युद्ध रुकवाने के लिए  यूएनओ चले गये 
सेना के बडते कदम रूक गये और आज कश्मीर का जो हिस्सा भारत मे है  ,सेना उतना ही पाकिस्तानी सेना से खाली करा पायी थी कि युद्ध विराम हो गयाशेख को कश्मीर का शासन मिलानेहरू जी के सौजन्य  से  370 और 35 से शेख को नवाजा गया जो आज कश्मीर की कठिनाई की जड है । नेहरू जी ने चीन से 1954 के अप्रैल 29 को एक करार किया था  । इसे पंचशील एकरारनामा कहा जाता हैइस करार से,भारत ने तिब्बत  के लिए जो अधिकार भारत को 1904 की Anglo-Tebatian traty  से मिली थी उसे खो दिया  । मतलब कि भारत ने तिब्बत पर चीन का अधिकार मान लिया  । यह भारत के लिए  सामरिक  लिहाज  से बेहद घातक साबित हुआ। इस इकरार की मियाद आठ साल की थी  । आठ साल बाद  चीन ने 1962 मे भारत पर आक्रमण कर दिया  यह देश का सबसे बदनसीब युद्ध था  । नेहरू जी की सरकार ने सेना के बजट मे कटौती कर रखी थी  । सैन्य  आयुधो का निर्माण बंद  कर दिया गया था  ! सीमांत चौकियों से सेना हटा दी गयी थी  चीन  को बेधड़क आगे बढने का सुनहरा  मौका मिला  । भारत को मिली अपमान जनक पराजय । साथ ही गंवानी पडी12000की0मी0 जमीन  पहली खता थी खंडित देश की आजादी कुबूल करना दूसरी खता थी370और35A से शेख  को नवाजना  तीसरी खता थी,20 जनवरी1948 को नेहरू जी का युद्ध विराम  के लिए यूएन   में जाना  ! चौयी खता 29 अप्रैल 1954 को चीन के साथ किया गया पंचशील करार  पांचवी खता 62 के चीन आक्रमण से पहले भारतीय सेना को हर तरह से कमजोर कर देना  इन खताओ की सजा देश आज तक भुगत रहा है और पता नहीं अभी कितनी सदियो तलक भुगतना बाकी है।  



   







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